इजराइल चुनाव में सस्पेंस बरकरार! 🇮🇱
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नेतन्याहू आगे, लेकिन बहुमत से दूर
इजराइल चुनाव में बड़ा सियासी उलटफेर: नेतन्याहू का गठबंधन 53 सीटों पर आगे, बहुमत से अब भी दूर; अरब पार्टियों के हाथ में सरकार की चाबी?
यरुशलम, 29 अक्टूबर 2026। इजराइल के आम चुनाव के बाद देश की राजनीति एक अहम मोड़ पर पहुंच गई है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के नेतृत्व वाला दक्षिणपंथी गठबंधन सीटों के मामले में आगे दिखाई दे रहा है, लेकिन संसद में स्पष्ट बहुमत हासिल करने से पीछे है। दूसरी ओर, विपक्षी गठबंधन भी अपने दम पर सरकार बनाने की स्थिति में नहीं पहुंचा है। इस बीच अरब नेतृत्व वाली राजनीतिक पार्टियों के प्रदर्शन ने सरकार गठन की पूरी गणित को और जटिल बना दिया है।
इजराइल के चुनावी नतीजों पर दुनिया की नजर इसलिए भी है, क्योंकि यह चुनाव नेतन्याहू के राजनीतिक नेतृत्व, देश की सुरक्षा नीति, गाजा युद्ध को लेकर उठे सवालों और इजराइल के भविष्य की दिशा से जुड़ा हुआ है। शुरुआती चुनावी अनुमानों में किसी भी प्रमुख राजनीतिक गठबंधन को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने से अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगली सरकार किस तरह बनेगी और क्या नेतन्याहू एक बार फिर प्रधानमंत्री पद पर बने रह पाएंगे?

120 सीटों वाली संसद में बहुमत का गणित
इजराइल की संसद को नेसेट (Knesset) कहा जाता है। इसमें कुल 120 सीटें हैं। किसी सरकार को सामान्य तौर पर बहुमत का समर्थन हासिल करने के लिए कम से कम 61 सांसदों का समर्थन चाहिए।
28 अक्टूबर को लगभग 90 प्रतिशत मतों की गिनती के दौरान सामने आए शुरुआती आंकड़ों के अनुसार, नेतन्याहू के गठबंधन को 53 सीटें मिलने का अनुमान था। वहीं, गादी आइज़ेनकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन के खाते में 48 सीटें जाती दिखाई दे रही थीं। अरब नेतृत्व वाली दो प्रमुख पार्टियों को मिलाकर 19 सीटों का अनुमान सामने आया था।
इस गणित के अनुसार, नेतन्याहू का गठबंधन बहुमत के आंकड़े से आठ सीट पीछे था, जबकि विपक्षी गठबंधन को बहुमत तक पहुंचने के लिए 13 अतिरिक्त सीटों के समर्थन की जरूरत थी।
29 अक्टूबर को सामने आए बाद के अपडेट में भी नेतन्याहू के गठबंधन के लिए 53 सीटों का अनुमान बरकरार रहा। हालांकि, अंतिम आधिकारिक परिणाम और विशेष श्रेणी के मतों की गिनती पूरी होने तक सीटों में बदलाव की संभावना बनी हुई है।
नेतन्याहू की पार्टी को कितनी सीटें?
नेतन्याहू की लिकुड पार्टी चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी है। शुरुआती परिणामों में लिकुड को लगभग 26 सीटें मिलने का अनुमान था। इसके बाद गादी आइज़ेनकोट की यशार पार्टी प्रमुख राजनीतिक दलों में शामिल रही।
हालांकि, किसी पार्टी का सबसे बड़ी पार्टी बनना और पूरे गठबंधन का बहुमत हासिल करना दो अलग-अलग बातें हैं। इजराइल की बहुदलीय संसदीय व्यवस्था में सरकार बनाने के लिए दूसरी पार्टियों का समर्थन भी महत्वपूर्ण होता है।
नेतन्याहू के साथ दक्षिणपंथी, अति-दक्षिणपंथी और अति-रूढ़िवादी धार्मिक दलों का गठबंधन है। इसमें लिकुड के अलावा शास, यूनाइटेड टोरा जूडिज्म, ओत्जमा येहुदित और धार्मिक जायनिज्म जैसे दल शामिल हैं।
इन पार्टियों के बीच सुरक्षा, धार्मिक नीतियों, सैन्य सेवा और सरकार की प्राथमिकताओं को लेकर कई मुद्दे हैं। गठबंधन को सत्ता में बने रहने के लिए इन सहयोगियों का समर्थन बनाए रखने के साथ-साथ अतिरिक्त सांसदों का समर्थन जुटाने की चुनौती का सामना करना पड़ सकता है।
अरब पार्टियों का प्रदर्शन क्यों है अहम?
इस चुनाव के सबसे महत्वपूर्ण पहलुओं में अरब नेतृत्व वाली पार्टियों का प्रदर्शन शामिल है। शुरुआती आंकड़ों में जॉइंट लिस्ट और राम पार्टी को मिलाकर 19 सीटें मिलने का अनुमान सामने आया। यह इजराइल की संसद में अरब नेतृत्व वाले राजनीतिक दलों के लिए ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण संख्या मानी जा रही है।
इजराइल में अरब नागरिक देश की आबादी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और वे चुनावों में अलग-अलग राजनीतिक दलों के माध्यम से भाग लेते हैं। अरब नेतृत्व वाली पार्टियां नागरिक अधिकारों, समानता, स्थानीय विकास, अपराध नियंत्रण और फिलिस्तीन से जुड़े मुद्दों को राजनीतिक बहस में उठाती रही हैं।
इन पार्टियों के पास संभावित रूप से 19 सीटें होने का मतलब यह है कि वे सरकार गठन की बातचीत में अहम भूमिका निभा सकती हैं। यदि विपक्षी गठबंधन इन दलों का समर्थन हासिल कर लेता है, तो उसके पास सीटों का ऐसा गणित बन सकता है जो 61 के बहुमत के आंकड़े से ऊपर हो।
लेकिन केवल सीटों की संख्या पर्याप्त नहीं है। राजनीतिक दलों को यह भी तय करना होगा कि वे किस तरह का समझौता करने के लिए तैयार हैं, क्या वे सरकार में शामिल होंगे या बाहर से समर्थन देंगे और किन नीतिगत शर्तों पर सहमति बन सकती है।
इसी वजह से अरब पार्टियों को संभावित रूप से सरकार गठन की प्रक्रिया में निर्णायक भूमिका निभाने वाला पक्ष माना जा रहा है। फिर भी, यह कहना जल्दबाजी होगी कि वे किसी एक गठबंधन को निश्चित रूप से सत्ता तक पहुंचा देंगी।
क्या विपक्ष नेतन्याहू को सत्ता से बाहर कर सकता है?
विपक्षी गठबंधन के सामने सबसे बड़ी चुनौती अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं वाले दलों को एक साथ लाने की है। गादी आइज़ेनकोट के नेतृत्व वाला गठबंधन और अन्य नेतन्याहू-विरोधी दल मिलकर सरकार बनाने की कोशिश कर सकते हैं, लेकिन इसके लिए उन्हें अतिरिक्त समर्थन जुटाना होगा।
अरब नेतृत्व वाली पार्टियों के साथ सहयोग इस दिशा में एक विकल्प हो सकता है। हालांकि, विपक्ष के सभी दल इस तरह के सहयोग को लेकर एकमत नहीं हैं। कुछ राजनीतिक दल अरब पार्टियों के समर्थन से सरकार बनाने के विचार पर आपत्ति जताते रहे हैं, जबकि अन्य दल इस तरह के सहयोग को संसदीय गणित का हिस्सा मानते हैं।
इसलिए विपक्ष के सामने दो चुनौतियां हैं। पहली, उसे बहुमत के लिए पर्याप्त सांसदों का समर्थन जुटाना होगा। दूसरी, उसे ऐसी साझा नीति और राजनीतिक समझ बनानी होगी जिसे गठबंधन के सभी प्रमुख सहयोगी स्वीकार कर सकें।
यदि विपक्ष पर्याप्त समर्थन नहीं जुटा पाता है, तो सरकार गठन की प्रक्रिया लंबी हो सकती है। दूसरी ओर, यदि विभिन्न दलों के बीच समझौता हो जाता है, तो नई सरकार का स्वरूप मौजूदा राजनीतिक समीकरणों से अलग भी हो सकता है।
क्या नेतन्याहू फिर प्रधानमंत्री बन सकते हैं?
नेतन्याहू का गठबंधन बहुमत से पीछे जरूर है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि उनके प्रधानमंत्री बने रहने की संभावना पूरी तरह समाप्त हो गई है।
संसदीय व्यवस्था में सरकार गठन केवल इस बात पर निर्भर नहीं करता कि किस गठबंधन को शुरुआती गिनती में सबसे अधिक सीटें मिलीं। यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि कौन-सा नेता पर्याप्त सांसदों का समर्थन जुटा सकता है और किस गठबंधन के पास संसद में विश्वास हासिल करने की बेहतर स्थिति है।
नेतन्याहू अतिरिक्त सहयोगियों का समर्थन हासिल करने, राजनीतिक समझौते करने या व्यापक गठबंधन बनाने की कोशिश कर सकते हैं। इसी तरह विपक्ष भी अलग-अलग दलों के साथ बातचीत करके वैकल्पिक सरकार बनाने का प्रयास कर सकता है।
एक अन्य संभावना यह है कि यदि कोई भी पक्ष स्थिर बहुमत बनाने में सफल नहीं होता, तो देश में राजनीतिक गतिरोध लंबा खिंच सकता है। हालांकि, केवल मौजूदा सीटों के आधार पर यह निश्चित नहीं कहा जा सकता कि आखिरकार कौन सरकार बनाएगा।
जब तक नई सरकार का गठन नहीं हो जाता, नेतन्याहू कार्यवाहक प्रधानमंत्री के रूप में बने रहेंगे। अंतिम परिणाम के बाद इजराइल के राष्ट्रपति इसहाक हर्जोग की भूमिका भी महत्वपूर्ण होगी। राष्ट्रपति राजनीतिक दलों के नेताओं से परामर्श करने और सरकार गठन की प्रक्रिया में अगला कदम तय करने में संवैधानिक भूमिका निभाते हैं।
गाजा युद्ध और सुरक्षा नीति का कितना असर?
इस चुनाव की पृष्ठभूमि में इजराइल की राष्ट्रीय सुरक्षा और गाजा युद्ध से जुड़े सवाल महत्वपूर्ण रहे हैं। 7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले के बाद इजराइल की सुरक्षा व्यवस्था, सैन्य कार्रवाई और सरकार की जवाबदेही पर देश में व्यापक राजनीतिक बहस हुई है।
नेतन्याहू और उनके सहयोगी सुरक्षा खतरों से निपटने, ईरान का मुकाबला करने और देश की सैन्य क्षमता को मजबूत रखने जैसे मुद्दों पर जोर देते रहे हैं। दूसरी ओर, उनके विरोधियों ने सुरक्षा व्यवस्था की विफलताओं, युद्ध के संचालन, बंधकों की वापसी और सरकार की जवाबदेही को लेकर सवाल उठाए हैं।
गाजा में युद्ध के मानवीय परिणामों और भविष्य की राजनीतिक व्यवस्था को लेकर भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा जारी है। हालांकि, चुनावी नतीजों से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि सभी मतदाताओं ने किसी एक मुद्दे को प्राथमिकता दी। मतदाताओं के फैसले पर सुरक्षा, अर्थव्यवस्था, धार्मिक नीतियों और राजनीतिक नेतृत्व जैसे कई कारकों का प्रभाव पड़ सकता है।
नई सरकार के गठन के बाद यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इजराइल की गाजा नीति, युद्धविराम से जुड़े प्रयासों, बंधकों के मुद्दे और क्षेत्रीय कूटनीति में क्या बदलाव आते हैं।
अब आगे क्या होगा?
सरकार गठन की प्रक्रिया में सबसे पहले अंतिम चुनावी परिणाम महत्वपूर्ण होंगे। इसके बाद राजनीतिक दलों के बीच बातचीत, समर्थन की घोषणा और गठबंधन की शर्तों पर चर्चा होगी।
नेतन्याहू का गठबंधन यदि अतिरिक्त समर्थन जुटा लेता है, तो वह सरकार बनाने की कोशिश कर सकता है। विपक्ष भी अरब नेतृत्व वाली पार्टियों तथा अन्य राजनीतिक समूहों के साथ संभावित समझौते की दिशा में आगे बढ़ सकता है।
यदि किसी भी पक्ष को पर्याप्त समर्थन नहीं मिलता, तो राजनीतिक गतिरोध और लंबी बातचीत की स्थिति बन सकती है। हालांकि, नई सरकार या संभावित नए चुनाव के बारे में कोई निश्चित निष्कर्ष निकालने से पहले आधिकारिक परिणाम और आगे की राजनीतिक घोषणाएं देखना जरूरी होगा।
निष्कर्ष
इजराइल के चुनाव ने एक बार फिर देश की बहुदलीय राजनीति और गठबंधन व्यवस्था की अहमियत सामने ला दी है। शुरुआती आंकड़ों में नेतन्याहू का गठबंधन सबसे आगे दिखाई दिया, लेकिन 61 सीटों का बहुमत हासिल नहीं कर पाया। वहीं, विपक्षी गठबंधन भी अपने दम पर बहुमत से पीछे रहा।
अरब नेतृत्व वाली पार्टियों की अनुमानित 19 सीटें सरकार गठन की बातचीत में महत्वपूर्ण हो सकती हैं, लेकिन उनके समर्थन की दिशा और शर्तें अभी निर्णायक सवाल हैं। आने वाले दिनों में अंतिम चुनावी आंकड़े, राजनीतिक दलों के बीच बातचीत और राष्ट्रपति की संवैधानिक प्रक्रिया यह तय करने में महत्वपूर्ण होंगे कि इजराइल में अगली सरकार किस तरह बनेगी।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है: क्या नेतन्याहू अतिरिक्त समर्थन जुटाकर सत्ता में बने रहेंगे, या विपक्ष विभिन्न दलों के साथ मिलकर एक वैकल्पिक सरकार बनाने में सफल होगा? इसका जवाब अंतिम नतीजों और गठबंधन वार्ताओं के बाद ही स्पष्ट होगा।
डिस्क्लेमर: यह रिपोर्ट उपलब्ध प्रारंभिक चुनावी आंकड़ों और सार्वजनिक रिपोर्टों पर आधारित है। सीटों के अनुमान अंतिम आधिकारिक परिणाम नहीं हैं और इनमें बदलाव संभव है।

