भारत में लगातार साइक्लोन आने की क्या है वजह?
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नई दिल्ली। भारत के पूर्वी तट पर अक्टूबर के आखिरी सप्ताह से नवंबर की शुरुआत तक लगातार दो शक्तिशाली चक्रवातों के पहुंचने से मौसम वैज्ञानिकों और तटीय क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की चिंता बढ़ गई है। खासतौर पर आंध्र प्रदेश के तट पर कुछ ही दिनों के अंतराल में दो बड़े चक्रवातों का प्रभाव देखने को मिला है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या भारत में साइक्लोन की संख्या तेजी से बढ़ रही है? क्या हिंद महासागर पहले से ज्यादा गर्म हो रहा है? और क्या जलवायु परिवर्तन (Climate Change) इसके पीछे एक बड़ी वजह है? मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, इन घटनाओं को केवल संयोग या जलवायु परिवर्तन के प्रभाव के रूप में देखना सही नहीं होगा। इसके पीछे समुद्र का तापमान, वायुमंडलीय परिस्थितियां, अल नीनो (El Niño), मानसून की वापसी और समुद्र में मौजूद ऊर्जा जैसे कई महत्वपूर्ण कारक काम करते हैं।
2026 में अब तक कितने साइक्लोन आए?
2026 के मौजूदा रिकॉर्ड के अनुसार, उत्तर हिंद महासागर में अब तक दो नामित चक्रवाती तूफान सामने आए हैं, जिन्होंने भारत के पूर्वी तट को प्रभावित किया है।

. 1 साइक्लोन अर्नब (Cyclone Arnab)
अक्टूबर 2026 में बंगाल की खाड़ी में विकसित हुआ अर्नब 28 अक्टूबर को आंध्र प्रदेश और यानम के तट से टकराया। यह बहुत गंभीर चक्रवाती तूफान (Very Severe Cyclonic Storm) की श्रेणी तक पहुंच गया था। लैंडफॉल के समय इसकी अधिकतम निरंतर हवा की रफ्तार लगभग 125–135 किलोमीटर प्रति घंटा और झोंकों की रफ्तार 150 किलोमीटर प्रति घंटा तक दर्ज की गई।
2. साइक्लोन मुरासु (Cyclone Murasu)
अर्नब के कुछ ही दिनों बाद बंगाल की खाड़ी में एक और शक्तिशाली चक्रवाती तूफान विकसित हुआ, जिसे मुरासु नाम दिया गया। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुसार, इसने 3 नवंबर 2026 को सुबह 3:30 से 5:30 बजे के बीच नेल्लोर और नरसापुर के बीच, ओंगोल के निकट दक्षिण आंध्र प्रदेश के तट को पार किया। लैंडफॉल के दौरान इसकी निरंतर हवा की रफ्तार 100–110 किलोमीटर प्रति घंटा और झोंकों की रफ्तार 120 किलोमीटर प्रति घंटा तक रही।
महत्वपूर्ण तथ्य: 3 नवंबर तक उपलब्ध IMD की जानकारी और IMD महानिदेशक के हवाले से प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, 2026 में ये उत्तर हिंद महासागर के दो नामित चक्रवाती तूफान हैं। इसलिए तीन साइक्लोन आने का दावा करना फिलहाल सही नहीं होगा। कम दबाव वाले क्षेत्र, डिप्रेशन और डीप डिप्रेशन को भी नामित साइक्लोन के साथ नहीं गिनना चाहिए।
आखिर क्यों अक्टूबर और नवंबर में ज्यादा साइक्लोन आते हैं?
भारत में चक्रवातों का मौसम पूरे साल एक जैसा नहीं रहता। उत्तर हिंद महासागर में मुख्य रूप से दो ऐसे समय होते हैं, जब चक्रवात बनने की परिस्थितियां अनुकूल होती हैं।
- पहला समय अप्रैल से जून के बीच होता है।
- दूसरा और अधिक सक्रिय समय अक्टूबर से दिसंबर के बीच होता है।
दक्षिण-पश्चिम मानसून की वापसी के बाद बंगाल की खाड़ी में हवाओं और वायुमंडलीय परिस्थितियों में बदलाव आता है। इस दौरान समुद्र के ऊपर नमी, गर्मी और अनुकूल पवन परिस्थितियां चक्रवातों के विकास में मदद कर सकती हैं।
2026 में भी दोनों बड़े चक्रवात अक्टूबर के आखिरी सप्ताह और नवंबर की शुरुआत में सामने आए हैं। इसलिए इनका एक ही अवधि में आना मौसम के सामान्य मौसमी चक्र से पूरी तरह अलग घटना नहीं है।
साइक्लोन बार-बार बनने के पीछे 5 बड़ी वैज्ञानिक वजहें
1. समुद्र के तापमान में बढ़ोतरी (Rising Sea Surface Temperature)
चक्रवातों को ऊर्जा समुद्र से मिलती है। जब समुद्र की सतह का तापमान लगभग 26.5 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक होता है और गर्म पानी पर्याप्त गहराई तक मौजूद रहता है, तो चक्रवात बनने और मजबूत होने के लिए अनुकूल परिस्थितियां बन सकती हैं।
बंगाल की खाड़ी में गर्म पानी और अधिक नमी का संयोजन चक्रवातों को ऊर्जा प्रदान करता है। वैज्ञानिक शोध में पिछले चार दशकों के दौरान बंगाल की खाड़ी के समुद्री सतह तापमान में लगभग 0.5 से 0.6 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि दर्ज की गई है।
हालांकि केवल समुद्र का गर्म होना किसी चक्रवात के बनने की गारंटी नहीं है। इसके लिए हवाओं और वायुमंडलीय परिस्थितियों का अनुकूल होना भी जरूरी है।
2. जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग (Climate Change)
ग्लोबल वार्मिंग के कारण महासागरों में अतिरिक्त गर्मी जमा हो रही है। इसका प्रभाव समुद्री तापमान, वातावरण में नमी और चक्रवातों की तीव्रता पर पड़ सकता है।
जब समुद्र ज्यादा गर्म होता है, तो वाष्पीकरण बढ़ सकता है। इससे वातावरण में जलवाष्प की मात्रा बढ़ती है। चक्रवात के अंदर जलवाष्प के संघनन से ऊर्जा निकलती है, जो अनुकूल परिस्थितियों में तूफान को और मजबूत कर सकती है।
भारत के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) द्वारा प्रस्तुत एक शोध के अनुसार, पिछले चार दशकों में उत्तर हिंद महासागर में गंभीर चक्रवातों की तीव्रता बढ़ने के पीछे गर्म समुद्री सतह, मध्य वायुमंडल में अधिक नमी और कमजोर ऊर्ध्वाधर पवन कतरन जैसे कारकों की भूमिका रही है।
इसका मतलब यह नहीं है कि हर साल चक्रवातों की संख्या बढ़ेगी। वैज्ञानिकों के अनुसार, कुल संख्या और उनकी विनाशकारी क्षमता के रुझान अलग-अलग हो सकते हैं।
3. अल नीनो और ला नीना (El Niño and La Niña)
प्रशांत महासागर में होने वाला अल नीनो और ला नीना भारत सहित पूरी दुनिया के मौसम को प्रभावित करते हैं।
अल नीनो के दौरान मध्य और पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर का पानी सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है। इससे वैश्विक वायुमंडलीय परिसंचरण में बदलाव आता है, जिसका असर बंगाल की खाड़ी में चक्रवात बनने वाली परिस्थितियों पर भी पड़ता है।
कई शोध बताते हैं कि अल नीनो के दौरान बंगाल की खाड़ी में चक्रवात बनने की गतिविधियां सामान्यतः कम हो सकती हैं, जबकि ला नीना के दौरान कुछ परिस्थितियों में चक्रवात बनने की संभावना बढ़ जाती है।
2026 में एक महत्वपूर्ण बात यह है कि अल नीनो की स्थिति मजबूत हो रही है। NOAA की अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, इसके जनवरी–मार्च 2027 तक मजबूत से बहुत मजबूत बने रहने की संभावना जताई गई है।
इसलिए 2026 में दो बड़े चक्रवातों का आना यह साबित नहीं करता कि अल नीनो के कारण चक्रवात बढ़े हैं। वास्तव में, अल नीनो के बावजूद अनुकूल स्थानीय समुद्री और वायुमंडलीय परिस्थितियों में शक्तिशाली तूफान बन सकते हैं।
4. समुद्र में जमा अतिरिक्त गर्मी (Ocean Heat Content)
सिर्फ समुद्र की ऊपरी सतह का तापमान ही महत्वपूर्ण नहीं होता, बल्कि समुद्र के अंदर कितनी गहराई तक गर्म पानी मौजूद है, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
इसे Ocean Heat Content कहा जाता है।
यदि समुद्र के अंदर गहराई तक गर्म पानी मौजूद है, तो चक्रवात के तेज हवाओं से समुद्र का पानी ऊपर-नीचे होने पर भी उसकी ऊर्जा आपूर्ति जल्दी कम नहीं होती। इसके कारण तूफान अपनी ताकत बनाए रख सकता है या और शक्तिशाली बन सकता है।
2026 में प्रकाशित Scientific Reports के शोध में बंगाल की खाड़ी के ऊपरी समुद्री तापमान, समुद्री गर्मी और वायुमंडलीय परिस्थितियों के बीच संबंध का अध्ययन किया गया है।
5. कमजोर वर्टिकल विंड शियर (Vertical Wind Shear)
यह चक्रवातों के निर्माण और उनकी ताकत को प्रभावित करने वाला एक महत्वपूर्ण कारक है।
जब समुद्र के पास चलने वाली हवाओं और ऊंचाई पर चलने वाली हवाओं की दिशा या गति में बहुत अंतर होता है, तो इसे Vertical Wind Shear कहते हैं।
यदि यह अंतर बहुत अधिक हो, तो चक्रवात की संरचना बिगड़ सकती है और उसका विकास रुक सकता है। इसके विपरीत, कमजोर विंड शियर चक्रवात को संगठित होने और मजबूत बनने का अवसर देता है।
यही वजह है कि समुद्र का तापमान अनुकूल होने के बावजूद हर कम दबाव का क्षेत्र चक्रवात नहीं बन पाता।
क्या वैज्ञानिक रिसर्च कहती है कि भारत में साइक्लोन बढ़ रहे हैं?
इस सवाल का जवाब थोड़ा जटिल है।
मई 2026 में Scientific Reports में प्रकाशित एक अध्ययन ने 1982 से 2022 तक बंगाल की खाड़ी की चक्रवाती गतिविधियों का विश्लेषण किया। इसमें पाया गया कि उत्तर हिंद महासागर के लगभग 75 प्रतिशत चक्रवात बंगाल की खाड़ी में उत्पन्न होते हैं।
इस अध्ययन के अनुसार, बंगाल की खाड़ी में लगभग 64.6 प्रतिशत चक्रवात मानसून के बाद यानी अक्टूबर से दिसंबर के दौरान आते हैं। शोध में यह भी सामने आया कि पिछले कुछ दशकों में कुल चक्रवातों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी का स्पष्ट प्रमाण नहीं है, लेकिन तेजी से तीव्र होने वाले चक्रवातों की गतिविधियों में बदलाव देखा गया है।
वहीं, जुलाई 2026 में Indian Institute of Remote Sensing (IIRS) के विज्ञान पोर्टल पर प्रकाशित 1996–2025 के 30 वर्षों के विश्लेषण में उत्तर हिंद महासागर में औसतन लगभग चार चक्रवात प्रतिवर्ष बनने की बात सामने आई। अध्ययन में 2019 में आठ और 2018 में सात चक्रवात दर्ज किए गए थे।
इन शोधों से स्पष्ट होता है कि चक्रवातों की संख्या में साल-दर-साल काफी उतार-चढ़ाव रहता है। इसलिए केवल एक साल में लगातार दो या तीन तूफान आने से दीर्घकालिक जलवायु परिवर्तन का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
क्या आने वाले वर्षों में भारत के लिए खतरा बढ़ सकता है?
विशेषज्ञों के लिए चिंता का विषय केवल चक्रवातों की संख्या नहीं, बल्कि उनकी तीव्रता, तेजी से मजबूत होने की क्षमता और तटीय क्षेत्रों पर पड़ने वाला प्रभाव भी है।
बंगाल की खाड़ी से उत्पन्न होने वाले चक्रवात आंध्र प्रदेश, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के तटीय इलाकों को प्रभावित कर सकते हैं। समुद्र का बढ़ता स्तर, भारी बारिश, तूफानी लहरें और तटीय इलाकों में बाढ़ का खतरा नुकसान को और बढ़ा सकता है।
इसके अतिरिक्त, चक्रवातों के कारण पूर्वी भारत के कुछ आंतरिक इलाकों में भी भारी बारिश हो सकती है। हालांकि किसी विशेष चक्रवात का उत्तर प्रदेश, बिहार या दिल्ली तक कितना प्रभाव होगा, यह उसके रास्ते, गति और कमजोर होने के बाद बची नमी पर निर्भर करता है।
निष्कर्ष
2026 में आंध्र प्रदेश के तट पर कुछ ही दिनों के अंतराल में आए अर्नब और मुरासु ने एक बार फिर बंगाल की खाड़ी की चक्रवाती गतिविधियों की ओर ध्यान आकर्षित किया है।
वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि गर्म समुद्र, समुद्र के भीतर जमा अतिरिक्त गर्मी, वायुमंडल में नमी, कमजोर विंड शियर और वैश्विक जलवायु परिस्थितियां मिलकर चक्रवातों को प्रभावित करती हैं।
हालांकि, यह कहना सही नहीं होगा कि भारत में हर साल साइक्लोन की संख्या लगातार बढ़ रही है। मौजूदा वैज्ञानिक प्रमाण अधिक शक्तिशाली तूफानों और उनकी बदलती गतिविधियों पर विशेष ध्यान देने की जरूरत बताते हैं।
आने वाले वर्षों में जलवायु परिवर्तन और समुद्री तापमान में बदलाव के बीच भारत के तटीय क्षेत्रों के लिए बेहतर मौसम पूर्वानुमान, समय पर चेतावनी और आपदा प्रबंधन पहले से अधिक महत्वपूर्ण होने वाले हैं।

